सुरता महेंद्र देवांगन माटी
"सुरता"...... महेन्द्र देवांगन माटी माटी के ये देंह ला, करे जतन तैं लाख। उड़ा जही जब जीव हा, हो जाही सब राख।।1।। का राखे हे देंह मा, काम तोर नइ आय । माटी के काया हरे, माटी मा मिल जाय।।2।। दोहा के ये कथन छत्तीसगढ़ी के युवा छंदकार महेन्द्र देवांगन माटी के आय जउन अपन माटी के काया ला माटी मा छोड़ के पंचतत्व मा विलीन होगे । सहज,सरल,मृदुभाषी स्व. महेंद्र देवांगन माटी जी के जाना छत्तीसगढ़ी साहित्य बर अपूरणीय क्षति आय। 16 अगस्त 2020 के हमन अइसन हस्ताक्षर ल खो देन जेन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल समृद्ध करत रहिन अउ अवइया दिन मा घलो छत्तीसगढ़ी साहित्य ल बहुत कुछ दे के जातिन। साहित्य के क्षेत्र मा माटी जाना पहिचाना नाम रहिन अउ अपन अलग पहिचान बनाइन। बीते डेढ़ दशक से भी जादा समय से उमन प्रदेश के अखबार अउ पत्र पत्रिका मा छाये रहिन। उँकर हिन्दी रचना के प्रकाशन देश के विभिन्न समाचार पत्र मा होवय। गद्य अउ पद्य दुनों म माटी जी समान रूप से लिखत रहिन। अब तक उँकर तीन कृति प्रकाशित होय रहिस- 1. पुरखा के इज्जत, 2. माटी के काया 3. हमर तीज तिहार (अंतिम कृति) । छन्द के छ से जुड़े...