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छत्तीसगढ़ी कब बनही राज-काज के भाखा ?

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                 //छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस विशेष// 28 नवंबर 2007 के  छत्तीसगढ़ विधानसभा हा  छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा दे खातिर विधेयक पारित करे रहिस । तब ले हमन 28 नवम्बर के दिन ला छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के रूप म मनाथन । 13 बछर होगे हवय छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा बने फेर अब तक राज काज के भाखा नइ बन पाना ये चिंता के विषय हे । पाठ्क्रम म छत्तीसगढ़ी भाखा ला शामिल करें के माँग कई बच्छर ले उठत हवय फेर अब तक वो मांग घलो पूरा नइ होय हवय। प्राथमिक स्तर म कक्षा पहली ले पाँचवीं तक कम से कम एक विषय छत्तीसगढ़ी ल अनिवार्य रूप से लागू करे जाय तेकर बाद धीरे-धीरे आघू बढ़ना चाही। फेर आज तक ये दिशा मा सार्थक पहल अब तक नइ होय हवय। छत्तीसगढ़ी के संग हल्बी, गोंडी, सरगुजिया अउ कुड़ुक मा घलो पढ़ाई- लिखाई के शुरुवात होना चाही। जब कोनो राज के भाखा,साहित्य अउ संस्कृति के विकास होही तभे सही मायने मा उँहा के मनखे मन के विकास होही। छत्तीसगढ़ी म सरलता अउ सहजता लाये खातिर देवनागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण के प्रयोग होना चाही संगे संग दूसर भाखा ले आये शब्द ल ज्यों के त्यों ल...

सुरता" सुशील यदु

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              सहज,सरल, मृदुभाषी और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी सुशील यदु जी के पिता का नाम स्वर्गीय खोरबाहरा राम यदु था । एम.ए.हिंदी साहित्य तक शिक्षा प्राप्त यदु जी प्राइमरी स्कूल में हेड मास्टर के पद पर थे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले ही छत्तीसगढ़ी भाखा को स्थापित करने के लिए जिन हस्तियों ने काम किया उनमें सुशील यदु का नाम अग्रिम पंक्ति में गिना जाता है।छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए हर वर्ष छत्तीसगढ़ में बड़े-बड़े आयोजन करना जिसमें प्रदेश भर से 400-500  साहित्यकारों को इकट्ठा करना उनके भोजन पानी की व्यवस्था करना ऐसा काम केवल सुशील यदु ही कर सकते थे । वे छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय हास्य व्यंग्य कवि के रूप में विख्यात थे।छत्तीसगढ़ी के उत्थान के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन खपा दिया और अंतिम सांस तक छत्तीसगढ़ी भाषा को स्थापित करने के लिए उपाय करते रहें ।                       सन 1981 में जब प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समित...

कुण्डलिया देवारी के

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(1) देवारी आये हवय,नाचय मन के मोर।  दीया बारव सब डहर,जगमग करय अँजोर।। जगमग करय अँजोर,मिटय जी सब अँधियारी। झूमव मिलके आज,सबो संगी सँगवारी। मन के भेद मिटाव,करव झन ककरो चारी। घर घर खुशी मनाव,परब आये देवारी।। (2) माटी के दीया बरत,बड़ निक लागत आज। देवारी आ गे हवय,जुरमिल करबों काज।। जुरमिल करबों काज, तभे खुशहाली लाबों। सुखी रहय परिवार,मया ला हम बगराबों। आवव मिलके आज,कुमत के गड्ढा पाटी। आघू पाछू ताय, सबों ला होना माटी। (3) गौरा गौरी गाँव मा, बइठारे हन आज। माँगत हन हम देव ले,सुग्घर होवय राज।। सुग्घर होवय राज,सबो झन खुशी मनावय। घर घर रहय तिहार, दुःख कोनो झन पावय। जगर बगर हे राज, गाँव घर अँगना चौरा। पूजत हन सब आज, गाँव मा गौरी गौरा। (4) हरियर के लुगरा पहिर,सुआ नाचे जाय। बहिनी मन सकलाय हे,देवारी हे आय।। देवारी हे आय, घरो घर नाचय सब झन। तरि हरि ना ना गाय, चलत हे सुग्घर बन ठन। कोनो पइसा अन्न, देत हे कोनो नरियर। सुग्घर देत असीस,पहिर के लुगरा हरियर। अजय अमृतांशु भाटापारा (छत्तीसगढ़)

आखिर कब रौशन होगा गरीब का घर...?

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आजादी के 70 सालों बाद भी इस प्रश्न का जवाब नहीं मिल पाया है । देश मे कई सरकारें आई और चली गई लेकिन यह यक्ष प्रश्न आज भी जनता के सामने खड़ा हुआ है । आखिर कौन नहीं चाहेगा की दिवाली के पावन पर्व पर गरीबों का घर भी रोशन हो, परन्तु सरकारी योजनाओं से निकली रौशनी अंतिम व्यक्ति के घर तक पहुंचते पहुँचते विलुप्त हो जाती है। इन सवालों के जवाब ढूंढने में न जाने और कितने वक़्त लगेगें ? सबसे पहले हम शहरी इलाकों की बात करते हैं। शहरी इलाकों में छोटे बड़े रोजगार के पर्याप्त अवसर होते हैं । गरीब तबके का जीवन स्तर उस पर निर्भर करता है जिस रोजगार से वह जुड़ा हुआ है उसे वह कितनी इमानदारी से करता है। ऐसे कुशल कामगार जो बढ़ई, मिस्त्री, वेल्डर,फिटर, मिल मिस्त्री आदि हैं जिनकी माँग हमेशा बनी रहती है उन श्रमिकों को चाहिए कि वे अवसर का पर्याप्त लाभ उठाएं । लेकिन ज्यादातर यह देखा जाता है कि यह वर्ग काम को अधूरा छोड़ कर अपने पैर में खुद ही कुल्हाड़ी मार लेते हैं। अब अब ऐसे कुशल कामगारों को कौन समझाए? सारी बातें सरकार के ही ऊपर नहीं छोड़ी जा सकती आम जनता को स्वयं से होकर अपने जीवन स्तर को सुधारना होगा।  गरीब त...
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संघर्ष ले उपजे जनकवि : कोदूराम "दलित"                                छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय के नाम ले मशहूर जनकवि कोदूराम "दलित" जी के जन्म 5 मार्च 1910 के ग्राम-टिकरी (अर्जुन्दा) जिला दुर्ग के  साधारण किसान परिवार म होय रहिस। किसान परिवार म पालन पोषण होय के कारण पूरा बचपन किसान अउ बनिहार के बीच म बीतिस।  ।आजादी के पहिली अउ बाद उन कालजयी सृजन करिन। समतावादी विचार,मानवतावादी दृष्टिकोण अउ यथार्थवादी सोंच के कारण आज पर्यन्त उन प्रासंगिक बने हवय। दलित जी के कृतित्व मा खेती किसानी के अदभुत चित्रण मिलथे। खेती किसानी ल करीब से देखे अउ जिये हवय येकर सेती उँकर गीत म जीवंत चित्रण मिलथे :- पाकिस धान-अजान,भेजरी,गुरमटिया,बैकोनी, कारी-बरई ,बुढ़िया-बांको,लुचाई,श्याम-सलोनी। धान के डोली पींयर-पींयर,दीखय जइसे सोना, वो जग-पालनहार बिछाइस,ये सुनहरा बिछौना। दुलहिन धान लजाय मनेमन, गूनय मुड़ी नवा के, आही हंसिया-राजा मोला लेगही आज बिहा के। स्...

क्रांतिकारी गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया

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  क्रातिकारी गीतकार : लक्ष्मण मस्तुरिया      "3 नवंबर पुण्यतिथि विशेष" "जागो रे जागो बागी बलिदानी मन.. धधकव रे धधकव सुलगत आगी मन..." अइसन गीत के एक-एक पंक्ति अउ एक-एक शब्द अन्तस् ल झकझोर देथे,अउ सीना चीर के सीधा अन्तस् मा उतरथे। छत्तीसगढ़ी गीत मा क्रांति के अइसन आह्वान करने वाला क्रांतिकारी गीतकार केवल लक्ष्मण मतुरिया ही हो सकथे कइहूँ ता गलत नइ होही। छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान जगइया मस्तुरिया जी के कलम ले क्रांति के चिंगारी निकलय। अन्याय,अत्याचार, जमाखोरी, बेरोजगारी, पलायन अउ नपुंसक राजनीति उपर उँमन निडर हो के कलम चलाइन । मस्तुरिया जी अपन गीत म कतेक गंभीर बात कहिथे :-         "जागो रे जागो बागी बलिदानी मन.. परिवर्तन उही ला सकथे जेन जुझारू होथे,बागी होथे, लड़े अउ मर मिटे बर हमेशा तियार रहिथे। अउ बलिदान भी उही मन दे सकथे जेन अपन मूँड़ी मा कफ़न बाँध के निकलथे । तब अइसन गीत बागी अउ बलिदानी मन बर टॉनिक के काम करथे । मस्तुरिया जी जब कहिथें-       "धधकव रे धधकव रे सुलगत आगी मन" तब देह के रूवाँ रूवाँ खड़ा हो जाथे। अन्याय अत्याचार के खिलाफ़ खड़ा ह...

सुरता महेंद्र देवांगन माटी

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"सुरता"...... महेन्द्र देवांगन माटी माटी के ये देंह ला, करे जतन तैं लाख। उड़ा जही जब जीव हा, हो जाही सब राख।।1।। का राखे हे देंह मा, काम तोर नइ आय । माटी के काया हरे, माटी मा मिल जाय।।2।। दोहा के ये कथन छत्तीसगढ़ी के युवा छंदकार महेन्द्र देवांगन माटी के आय जउन अपन माटी के काया ला माटी मा छोड़ के पंचतत्व मा विलीन होगे । सहज,सरल,मृदुभाषी स्व. महेंद्र देवांगन माटी जी के जाना छत्तीसगढ़ी साहित्य बर अपूरणीय क्षति आय। 16 अगस्त 2020 के हमन अइसन हस्ताक्षर ल खो देन जेन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल समृद्ध करत रहिन अउ अवइया दिन मा घलो छत्तीसगढ़ी साहित्य ल बहुत कुछ दे के जातिन। साहित्य के क्षेत्र मा माटी जाना पहिचाना नाम रहिन अउ अपन अलग पहिचान बनाइन। बीते डेढ़ दशक से भी जादा समय से उमन प्रदेश के अखबार अउ पत्र पत्रिका मा छाये रहिन। उँकर हिन्दी रचना के प्रकाशन देश के विभिन्न समाचार पत्र मा होवय। गद्य अउ पद्य दुनों म माटी जी समान रूप से लिखत रहिन। अब तक उँकर तीन कृति प्रकाशित होय रहिस- 1. पुरखा के इज्जत, 2. माटी के काया 3. हमर तीज तिहार (अंतिम कृति) । छन्द के छ से जुड़े...

महतारी के पीरा (लघुकथा)

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                 भुरी (घर के बाहिर गली म घुमइया कुतिया) ह 2 दिन ले सरलग  घर के गेट म आके कूँ...कूँ...कहिके नरियाय (रोवय) । रोही काबर नहीं ...?  आज अपन आखिरी पिला ल घलो गँवा डरिस ।  नरियाय त अइसे लगय मानो पूछत हवय मोर पिला ह कहाँ हे..? घर के जेन मनखे गेट के बाहिर निकलतिस तेकर तीर मा आ के नरियाय, आँखी ले आँसू तरतर तरतर बोहात रहय ।                भुरी ह 3 ठन पिला बियाय रहिस तेमा के एक ठन ल पहिलिच कोनो उठा के लेगे।  दू ठन पिला ल गली के एक कोंटा मा खम्भा के तिर मा पोसत रहिस । कोनो रोटी देदय ता कोनो रात के बाँचे खोंचे भात ला। लईकोरहिन रहिस तेकर सेती कोनो ना कोनो खाय बर देच दय । घर के गेट ले बुलक के नान-नान पिला मन घर भीतरी आ जतिस ता भुरी घलो पाछू-पाछू भीतरी आय बर छटपटातिस। पिला संग लइका मन खेल के गेट ले बाहिर निकाल दय ,भुरी वोला ले के लहुट जाय । कुतिया हा सफेद रंग के चकचक ले दिखय तेखर सेती दाई ह ओला भुरी कहिके बलाय।                  भुरी ...