कुण्डलिया देवारी के


(1)

देवारी आये हवय,नाचय मन के मोर। 

दीया बारव सब डहर,जगमग करय अँजोर।।

जगमग करय अँजोर,मिटय जी सब अँधियारी।

झूमव मिलके आज,सबो संगी सँगवारी।

मन के भेद मिटाव,करव झन ककरो चारी।

घर घर खुशी मनाव,परब आये देवारी।।


(2)

माटी के दीया बरत,बड़ निक लागत आज।

देवारी आ गे हवय,जुरमिल करबों काज।।

जुरमिल करबों काज, तभे खुशहाली लाबों।

सुखी रहय परिवार,मया ला हम बगराबों।

आवव मिलके आज,कुमत के गड्ढा पाटी।

आघू पाछू ताय, सबों ला होना माटी।


(3)

गौरा गौरी गाँव मा, बइठारे हन आज।

माँगत हन हम देव ले,सुग्घर होवय राज।।

सुग्घर होवय राज,सबो झन खुशी मनावय।

घर घर रहय तिहार, दुःख कोनो झन पावय।

जगर बगर हे राज, गाँव घर अँगना चौरा।

पूजत हन सब आज, गाँव मा गौरी गौरा।


(4)

हरियर के लुगरा पहिर,सुआ नाचे जाय।

बहिनी मन सकलाय हे,देवारी हे आय।।

देवारी हे आय, घरो घर नाचय सब झन।

तरि हरि ना ना गाय, चलत हे सुग्घर बन ठन।

कोनो पइसा अन्न, देत हे कोनो नरियर।

सुग्घर देत असीस,पहिर के लुगरा हरियर।


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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